
टोरंटो । कनाडा की राजनीति में अब तक पंजाबी समुदाय का खूब वर्चस्व रहा हैं, फिर चाहे वह संसद में सिख सांसदों की संख्या हो, या मैदान पर चुनावी समीकरण साधन हो। लेकिन 2025 के आम चुनावों (अब अप्रैल के अंत में) में पहली बार गुजराती समुदाय के चार उम्मीदवारों की दावेदारी ने राजनीति के समीकरणों को बदल दिया है। चार गुजराती उम्मीदवार जयेश ब्रह्मभट्ट, संजीव रावल, अशोक पटेल और मिनेश पटेल अलग-अलग पार्टियों और निर्दलीय रूप में चुनावी मैदान में हैं। बात दें कि कनाडा में 1 लाख से अधिक गुजराती मूल के लोग रहते हैं, जो कारोबार, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, आईटी और रिटेल सेक्टर में मजबूत पकड़ रखते हैं। इन उम्मीदवारों का आधार कनाडा में स्थायी तौर पर बसे मिडिल क्लास और बिजनेस क्लास लोगों में है। दरअसल गुजराती समुदाय खालिस्तान विचारधारा के सख्त विरोधी माने जाते हैं। 2023 में खालिस्तान समर्थकों द्वारा मंदिरों पर विरोध के बाद हिंदू और पंजाबी समुदायों के बीच मतभेद और गहरे हुए। यदि गुजराती समुदाय को राजनीति में ठोस स्थान मिला, तब भारत-कनाडा संबंधों पर संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है। सिर्फ 1.9 प्रतिशत आबादी, लेकिन 4 प्रतिशत सांसद सिख समुदाय से हैं (16 सिख सांसद)। खासतौर पर ब्रिटिश कोलंबिया और ओंटारियो में निर्णायक वोट बैंक। क्या गुजराती-पंजाबी टकराव होगा? संभावना कम है। कनाडा की मल्टीकल्चरल सोसायटी इसतरह के टकराव को सीमित ही रखती है। साझा भारतीय पहचान, भाषा, खानपान और कारोबारी हित कई बार दोनों समुदायों को जोड़ने का काम करते हैं। हां, अगर खालिस्तान मुद्दा दोबारा जोर पकड़ता है, तब राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। गुजराती उम्मीदवारों की राजनीति में एंट्री कनाडा की भारतीय डायस्पोरा राजनीति में नई शुरुआत है। इससे खालिस्तानी एजेंडे को चुनौती मिल सकती है, लेकिन यह पंजाबी वर्चस्व को खत्म नहीं करेगा।
