
कराची । क्वेटा में पाकिस्तानी सेना का प्रमुख कमांड सेंटर और मिलिट्री बेस है। यहीं पर क्वेटा स्टाफ कॉलेज भी है, जिसे पाकिस्तान आर्मी की ‘ब्रेन फैक्ट्री’ कहा जाता है। यहीं पर सेना बलूच विद्रोहियों पर हमले की रणनीति बनाती है। अगर यहां बलूच विद्रोही पहुंच गए तो तबाही के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। बलूच विद्रोहियों की प्रमुख पार्टी बलूचिस्तान नेशनल पार्टी-मेंगल के अध्यक्ष सरदार अख्तर मेंगल ने 6 अप्रैल को क्वेटा की ओर कूच करने का ऐलान किया है। उनका मकसद महरंग बलोच समेत बंद कार्यकर्ताओं को छुड़ाना है। इस ऐलान ने शहबाज सरकार की मुसीबतें बढ़ा दी है। बीएनपी-मेंगल के चीफ सरदार अख्तर मेंगल ने कहा, हम अब विद्रोहियों को और रौंदने नहीं देंगे। पाकिस्तानी सेना और सरकार हमारे नेताओं को निशाना बना रही है। हम ये बर्दाश्त नहीं कर सकते और अब आरपार की जंग होगी। हाल ही में महरंग बलूच समेत कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और जबरन गायब करने की घटनाओं ने बलूच समुदाय में आक्रोश पैदा कर दिया है। मेंगल ने कहा, क्वेटा तक मार्च हमारा हक है। अब हमारी आवाज सेना के गढ़ में गूंजेगी। अगर वे हमें रोकेंगे, तो यह उनकी क्रूरता का सबूत होगा। यह कूच वाध से शुरू होकर क्वेटा तक जाएगा, जिसमें हजारों बलूच प्रदर्शनकारी शामिल हो सकते हैं। क्वेटा न केवल बलूचिस्तान की राजधानी है, बल्कि पाकिस्तानी सेना का रणनीतिक केंद्र भी है। यहां स्थित मिलिट्री बेस और कमांड सेंटर से बलूच विद्रोह को दबाने की योजनाएं बनती हैं। अगर बीएनपी-मेंगल और बलूच विद्रोही क्वेटा तक पहुंचते हैं, तो यह सेना की साख और कंट्रोल पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा। जाफर एक्सप्रेस हाईजैकिंग के बाद सेना पहले ही दबाव में है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्वेटा में प्रदर्शन सेना के लिए ‘घर में घुसकर चुनौती’ जैसा होगा। एक सैन्य विश्लेषक ने कहा, अगर बलूच विद्रोही क्वेटा में भीड़ जुटाने में कामयाब रहे, तो यह सेना की विफलता का प्रतीक बनेगा। अगर 6 अप्रैल को क्वेटा कूच होता है, तो इसके दो नतीजे हो सकते हैं। पहला, सेना बल प्रयोग करके प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश करेगी, जिससे हिंसा भड़क सकती है और बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) जैसे सशस्त्र समूह सक्रिय हो सकते हैं। दूसरा, अगर प्रदर्शनकारी क्वेटा पहुंच गए, तो यह बलूच आंदोलन की बड़ी जीत होगी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित होगा। बलूचिस्तान में पहले से ही तनाव चरम पर है।
